Bagalamukhi Mata : Shatru Nash, Shubh Muhurat & Online Booking

Bagalamukhi Mata
बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) दस महाविद्याओं में आठवीं अत्यंत शक्तिशाली देवी के रूप में पूजित हैं। उन्हें शत्रु-नाशिनी और विजय प्रदान करने वाली देवी कहा जाता है। बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) के मुख से सदैव पीली आभा प्रकट होती है, इसी कारण उन्हें पीताम्बरा के नाम से भी जाना जाता है।
बगलामुखी का उल्लेख कई तांत्रिक और पौराणिक ग्रंथों में किया गया है, विशेष रूप से उन ग्रंथों में जिनमें दस महाविद्याओं का वर्णन है, जैसे कि तंत्र शास्त्र, कुञ्जिका तंत्र, और रुद्रयामल (जिसका एक भाग 'बगलामुखी स्तोत्र' है)। इन ग्रंथों में उन्हें ब्रह्मास्त्रस्थम्बिनी विद्या और पीतम्बरा देवी के रूप में वर्णित किया गया है, जो स्तंभन की शक्ति (रोकने या स्थिर करने की) से संपन्न हैं।
बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) कौन हैं? (महाविद्या में स्थान और महत्व)
हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार माता बगलामुखी के प्राकट्य के कुछ प्राचीन कथाएँ मिलती हैं जो इस प्रकार हैं-
बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) की उत्पत्ति कथा (प्राकट्य की पौराणिक कहानी)
सत्ययुग, जिसे स्वर्ण युग भी कहा जाता है, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चार युगों में पहला युग था। इस समय धरती पर धर्म और सत्य चारों ओर फैला हुआ था।
कथाओं के अनुसार, एक बार असुरों ने चारों वेदों को छिपाकर पाताल लोक में ले लिया, जिससे सृष्टि का संतुलन डगमगा गया। वेदों के बिना ब्रह्मांड का संचालन असंभव हो गया और एक महाभयंकर प्रलय का सृजन हुआ, ऐसा प्रलय जो संपूर्ण ब्रह्मांड को निगलकर उसे अस्तित्वविहीन करने की क्षमता रखता था। इस प्रलय के विध्वंस से सृष्टि की रक्षा हेतु पालनहार श्रीहरि विष्णु महादेव के पास गए। महादेव ने बताया कि इस महाभयंकर प्रलय को केवल आदिशक्ति ही रोक सकती हैं, क्योंकि वही संपूर्ण सृष्टि की जननी हैं।
उन्होंने श्रीहरि विष्णु को आदिशक्ति की तपस्या कर उनका आवाहन करने का सुझाव दिया। आदिशक्ति को प्रसन्न करने के लिए श्रीहरि विष्णु ने सौराष्ट्र की हरिद्रा नामक झील के समीप कठोर तपस्या की। इस झील का जल हल्दी के समान पीला था, इसी कारण इसे हरिद्रा झील कहा गया। तपस्या से प्रसन्न होकर मध्यरात्रि में आदिशक्ति ने बगलामुखी के रूप में दर्शन दिए। जैसे ही देवी ने प्रलय की ओर दृष्टि डाली, प्रलय जड़ होकर रुक गया। इस प्रकार देवी पार्वती के इस रूप ने संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा की।
मदनासुर वध की कथा: कैसे बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) ने वाणी को स्तंभित किया
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, मदनासुर नामक एक अत्यंत उपद्रवी असुर के अत्याचारों से माता ने पृथ्वीलोक और देवलोक की रक्षा की थी। मदनासुर ने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या कर वाक्-सिद्धि का वरदान प्राप्त किया था। उसके पास यह अद्भुत शक्ति थी कि वह जो कुछ भी बोलता, वही सत्य हो जाता। जब मदनासुर ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर चारों ओर हाहाकार मचा दिया, तब देवी बगलामुखी अर्द्धरात्रि में प्रकट हुईं और उसकी जिह्वा पकड़ ली, जिससे वह पंगु/ paralyzed हो गया और उसकी वाणी निष्क्रिय हो गई। इसके पश्चात माता ने उसका नाश किया।
शत्रुओं के कार्यों और उनकी बोलने की क्षमता को रोकने हेतु माता बगलामुखी का आवाहन किया जाता है।
बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) का स्वरूप
माता को पीला रंग अति प्रिय है। उनके मुँह से सदैव सुनहरी आभा निकलती रहती है, वे पीले वस्त्र धारण करती हैं, पीले आभूषण पहनती हैं और उनकी पूजा भी पीले हल्दी का विशेष महत्व होता है। माँ की ज्योति भी पीले रंग की बत्ती से प्रज्वलित की जाती है। पीला रंग प्रिय होने के कारण मां को पीताम्बरी नाम से भी जाना जाता है।
बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) की पूजा के लाभ (शत्रु बाधा, कोर्ट केस और नजर दोष से मुक्ति)
नियमित रूप से देवी माँ की पूजा करने से शत्रुओं से बचाव होता है। यदि कोई व्यक्ति अच्छे कर्म करने के बावजूद कानूनी मामलों में उलझा हुआ है, तो ऐसे मामलों में विशेष उपाय सहायक हो सकते हैं।
देवी माँ के प्रति सच्ची श्रद्धा से दुर्लभ चीजों की प्राप्ति भी संभव है। इस साधना के माध्यम से सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के सुख प्राप्त किए जा सकते हैं।
जीवन में काई अथक प्रयास के बाद भी हम सफल नहीं हो पाते। इसके पीछे का कारण हैं तंत्र मंत्र और नजरदोष। माँ बगलामुखी की पूजा से हम भयंकर तंत्र के प्रभाव को रोक सकते हैं माँ की स्तम्भन की शक्ति सारी आपदाओं को जड़ कर देती हैं।
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बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) के साधना के नियम और सावधानियां (गुरु मार्गदर्शन क्यों जरूरी है)
बगलामुखी की साधना करते समय हमें ये ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि बिना गुरु मार्गदर्शन के ये साधना पूर्ण फल नहीं दे पाती। मां के मंत्र बहुत शक्तिशाली होते हैं मंत्रो के ऊर्जा को खुद में उतारने के लिए गुरु मार्गदर्शन की अत्यंत अविष्कारक हैं। बगलामुखी साधना निश्चित रूप से दोषी के ऊपर बुरा प्रभाव डालते हैं। अगर मनुष्य सत्य मार्ग पर है तो माँ का कृपा पात्र बनता है।
बगलामुखी साधना करने से पहले हम श्रीगणेश की पूजा करते हैं और साधना के मंत्र भैरव का आह्वान करते हैंनलखेड़ा बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) का मंदिर (मध्य प्रदेश) का महत्व और इतिहास
भारत में बगलामुखी के तीन प्रमुख ऐतिहासिक स्थान नलखेड़ा (मध्य प्रदेश), बनखंडी (कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश), और दतिया (मध्य प्रदेश) हैं; नलखेड़ा और दतिया, दोनों मध्य प्रदेश में हैं, जबकि तीसरा हिमाचल प्रदेश में है, और इन तीनों को सिद्धपीठ माना जाता है ।
नलखेड़ा (मध्य प्रदेश)
मान्यताओं के अनुसर था देवी सती की जीभ गिरी थी। ये माता त्रिशक्ति के रूप में विराजमान हैं-देवी बगलामुखी, देवी सरस्वती, देवी लक्ष्मी। बगलामुखी की ये प्रतिमा स्वयंभू है अर्थात् स्वयं प्रकट हुई है।
यहां स्थापित देवी बगलामुखी की पीली प्रतिमा मानो साक्षात दिव्य प्रकाश का अवतार है। उनकी सुनहरी आभा अज्ञान, भय और नकारात्मकता को शांत करती प्रतीत होती है।
इस मंदिर के चारो और शमशान हैं और पीछे लखुन्दर नदी (जिसे प्राचीन समय में लक्ष्मणा नदी भी कहा जाता है) ।
माँ बगलामुखी की यह मूर्ति केवल एक प्रतिमा नहीं, बल्कि मौन में समाई अपार शक्ति का प्रतीक है। प्राचीन काल में, नलखेड़ा में स्थित यह प्रसिद्ध माँ बगलामुखी मंदिर अत्यंत पवित्र और दिव्य माना जाता था। ऐसा माना जाता है कि पांडवों ने भगवान कृष्ण के मार्गदर्शन में इस मंदिर की स्थापना की थी। पांडवो ने स्वयं यहाँ माँ बगलामुखी के 36 अक्षरो वाले मंत्र का जाप किया था।
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माँ बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) का मंत्र (36 अक्षरी स्तंभन मंत्र और उसका महत्व)
माँ बगलामुखी का 36 अक्षरी मंत्र है:
"ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा"
ताकि धर्म की विजय सुनिश्चित हो। यह युद्ध मात्र हथियारों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि सत्य और अधर्म के बीच संघर्ष था। अपने धर्म और सत्य में अडिग रहते हुए, पांडवों ने रक्षा और विजय के लिए देवी बगलामुखी का आशीर्वाद मांगा और अंततः धर्म की ही विजय हुई।
ऐसा माना जाता है कि भगवान राम ने हनुमान के मार्गदर्शन में राक्षस राजा रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए माता बगलामुखी की पूजा की थी।
ऐसा केवल प्राचीन काल में ही नहीं होता था, बल्कि आज भी हम प्रतिदिन देखते हैं कि सत्य के मार्ग पर चलने वाले कई लोग कठिन परिस्थितियों से घिरे रहते हैं।जब वे पूर्ण श्रद्धा और विधिपूर्वक मां बगलामुखी की पूजा करते हैं, तो उन्हें निश्चित रूप से माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
अगर अभी भी आपको शुभ मुहूर्त और पूजा विधि को लेकर भ्रम है, तो देर न करें-यह बहुत ही संवेदनशील पूजा होती है। तुरंत हमारे अनुभवी पंडितों से अपनी पूजा बुक करें और सही विधि से पूजा करवाएं।
बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) के हवन के प्रकार (सामान्य, विशेष और महा विशेष हवन)
सामान्य हवन -ये हवन सामान्य लोगो के लिए होता है, इस जीवन में दुख व भय का नाश होता है।
विशेष हवन- इस हवन में 21 प्रकार की जड़ी-बूटियों का प्रयोग किया जाता है। पूर्ण विधिनुसार कराया गया ये हवन अत्यंत फलदाई होता है।
महा विशेष हवन - इस तीसरे प्रकार के हवन में 36 प्रकार की विशेष औषधियां डाली जाती हैं। ये हवन शत्रु विग्रह, कोर्ट के अंगीनत चक्कर, नज़र दोष वी तंत्र में तत्काल प्रभावशाली होता है।
नज़र दोष और शत्रु विग्रह से बचने के लिए पीले गेंदे के फूल पीली सरसो हल्दी की गांठ सेंधा नमक लाल मिर्च इत्यादि से माँ का कड़वा हवन किया जाता है वही अगर जातक सुख समृद्धि धन धान्य के लिए हवन कर रहा है तो हवन में मेवा, सुगंध इत्यादि का भी प्रयोग होता है।
बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) के साबुत लाल मिर्च के हवन के के बारे में मान्यता है कि मान्यता मिलती है कि ये शूल से शत्रु का विनाश होता है।
बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) की सच्ची पूजा क्या है? (भाव और श्रद्धा का महत्व)
शंकराचार्य जी ने कहा है कि सबसे श्रेष्ठ पूजा मानस पूजा होती है-वह पूजा जो हम पूर्ण भाव, श्रद्धा और समर्पण के साथ मन से करते हैं।
यदि साधक के पास अधिक साधन या आर्थिक क्षमता न भी हो, फिर भी सच्चे हृदय से की गई पूजा बगलामुखी माता (Bagalamukhi Mata) तक अवश्य पहुँचती है। भाव से किया गया स्मरण और समर्पण ही वास्तविक आराधना है।








