दीपदान का महत्व: पुराणों में वर्णित दीपदान की विधि और फल
दीपदान की महिमा—तुलसीदास जी कहते हैं, राम नाम का दीपक देहरी पर प्रज्वलित हो तो अंतः और बाह्य दोनों लोक प्रकाशित हों।
By Pangkhuri Kumari
History & Spiritual Content Writer| PoojaKaro
दीपक को सनातन धर्म में अग्नि देवता का प्रतीक माना जाता है। हर शुभ कार्य से पहले दीपक प्रज्वलित की परंपरा इसलिए है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि अग्नि देव को साक्षी मानकर किया गया काम हमेशा सफल होता है। दीपक सिर्फ प्रकाश नहीं देता, बल्कि यह सकारात्मकता और ऊर्जा का प्रतीक भी है। दीपदान को हमारे लगभग सभी पुराणों में अत्यंत शुभ और शीघ्र फल देने वाला माना गया है। दीपक का महत्व बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-
दोहा:
राम नाम मणि दीप धरु, जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौं चाहसि उजिआर॥
भावार्थ / व्याख्या:
तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि मनुष्य अपने जीवन में भीतर और बाहर—दोनों तरफ प्रकाश चाहता है, अर्थात् लौकिक (सांसारिक) और पारमार्थिक (आध्यात्मिक) ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, तो उसे अपने हृदय और जीवन में दीपक का प्रकाश बनाए रखना चाहिए। जैसे राम-नाम का निरंतर सुमिरन अंतःकरण और बाहरी जीवन को उजाला देता है, वैसे ही दीपदान के दौरान जलाया गया दीप हमारे मन और जीवन से अंधकार, नकारात्मकता और अशांति को दूर कर, ज्ञान और चेतना का प्रकाश फैलाता है।
गंगा, यमुना और सरस्वती के पावन संगम पर श्रद्धा और नियमपूर्वक, सुयोग्य वैदिक पंडित द्वारा विधि-विधान से किया गया दीपदान विशेष फल प्रदान करता है। यह देवताओं, पितृगणों तथा मनुष्यों—तीनों के हित और कल्याण का कारण माना जाता है। जब हम दीपदान करते हैं, तो वह केवल दीप जलाने की क्रिया नहीं होती। उस दीप के साथ हमारे हृदय का प्रेम, श्रद्धा और समर्पण भी जुड़ा होता है।
धर्मग्रंथों के अनुसार दीपदान के सही नियम एवं विधि
दीपदान का उल्लेख हमें स्कंदपुराण में भी मिलता है। इसमें ब्रह्माजी नारद जी को बताते हैं कि दीपदान के नियम क्या हैं और इसे कैसे विधिपूर्वक करना चाहिए।
दीपदान वैदिक नियम और मंत्र के अनुसार योग्य पंडित द्वारा किया जाता है। दीपक को कितनी बार घुमाना है, इसके पीछे भी खास कारण होते हैं;
उदाहरण के लिए, दो बार घुमाने का अपना अर्थ है। कि अलौकिक और लौकिक में भेद खतम हो जाए , मैं अलौकिक को प्राप्त हूँ।यह भाव दर्शाता है कि साधक सांसारिक सीमाओं से ऊपर उठकर आध्यात्मिक चेतना को प्राप्त करना चाहता है
दीपक को तीन बार घुमाने का अर्थ यह होता है कि रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण—इन तीनों गुणों के प्रति मन पूरी तरह संतुलित हो जाए।
जिस प्रकार अंधेरे में जलाया गया एक दीपक अपने आसपास के अंधकार को दूर कर देता है, उसी प्रकार दीपदान में अर्पित किए गए दीप हमारे जीवन से नकारात्मकता को धीरे-धीरे समाप्त कर देते हैं। यह दीप केवल बाहरी प्रकाश नहीं देते, बल्कि मन के भय, तनाव और अशांति को भी दूर कर जीवन में सकारात्मकता और आशा का उजाला भर देते हैं।
हमारे पुराणों और वैदिक ग्रंथों में बार-बार यह कहा गया है कि दीपदान अत्यंत पुण्यदायी कर्म है। यदि यह दीपदान सही भाव से, विधि-विधान के अनुसार और योग्य वैदिक पंडित के मार्गदर्शन में किया जाए, तो इससे न केवल इस जन्म के, बल्कि पूर्व जन्मों के पापों का भी नाश होता है।
शिवपुराण में वर्णित विधि के अनुसार किसी पवित्र नदी के घाट पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके अपने पूर्वजों का आदरपूर्वक स्मरण करते हुए दीप अर्पित किया जाता है। इस प्रकार श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया दीपदान पितरों की विशेष कृपा लाता है ।
शनि के प्रकोप से बचने के लिए, घर में चल रहे कलह से मुक्ति पाने के लिए, धन-लाभ के लिए, पढ़ाई में सफलता के लिए और पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए दीपदान बहुत लाभकारी माना गया है। अपनी कुंडली और इष्ट देवता के अनुसार, या जिस देवता की पूजा व्यक्ति के लिए उपयुक्त हो, उनके नाम से योग्य वैदिक पंडित द्वारा विधि-विधान से दीपदान कराया जाए, तो इससे जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और विशेष लाभ प्राप्त होता है।








